करवा चौथ पर सास को दे उपहार
करवा चौथ : चंद्रोदय रात्रि 8:31 बजे
इस वर्ष 10 अक्टूबर, शुक्रवार को करवा चौथ का व्रत है। यह व्रत विवाह होने के बाद ही किया जाता है। इस दिन विवाहित महिलाएं निर्जला उपवास रखती हैं और शाम को सोलह श्रृंगार कर चंद्रमा को अध्र्य अर्पित करती हैं। पं. गिरधारी सूरा पुरोहित ने बताया कि करवा चौथ पर माता करवा के साथ शिव-पार्वतीजी की पूजा करने का विधान है। इस दौरान चंद्रमा को अध्र्य देने के साथ पीतल या मिट्टी के टोटी वाले करवा के साथ पूजा की जाती है जिसकी टोटी में कांस की सींक लगाई जाती है। बता दें कि सींक को शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इसके साथ ही करवा का श्रीगणेश से संबंधित है। इस व्रत में रात्रि बेला में शिव, पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, गणेश और चंद्रमा के चित्रों एवं सुहाग की वस्तुओं की पूजा का विधान है। कुछ स्त्रियां परस्पर चीनी या मिट्टी का करवा आदान-प्रदान करती हैं। लोकाचार में कई स्त्रियां काली चिकनी मिट्टी के कच्चे करवे में चीनी की चासनी बनाकर डाल देती हैं अथवा आटे को घी में सेंककर चीनी मिलाकर लड्डू आदि बनाती हैं। करवा चौथ का व्रत विश्वास और प्रेम का प्रतीक माना जाता है, और इसका विशेष धार्मिक महत्व होता है। करवा चौथ को सोशल मीडिया में फैल रहे उपहास की भांति बिल्कुल न लें। यदि किसी महिला को करवा चौथ के समय मासिक धर्म हो तो व्रत कर लेना चाहिए लेकिन पूजा-विधि स्वयं न करें। आप मन ही मन श्रद्धा और भाव से चंद्रमा को नमन कर सकती हैं और उसके दर्शन के बाद पानी पीकर व्रत का समापन करें। इस प्रकार, बिना विधिवत पूजा किए भी आपका व्रत पूर्ण माना जाएगा। करवा चौथ पर इस साल सिद्धि योग, शिवावास योग बन रहा है। इसके साथ ही बुधादित्य, शुक्रादित्य, कुलदीपक, नवपंचम जैसे राजयोगों का निर्माण हो रहा है, जो बेहद खास है। करवा चौथ का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद खास माना जाता है। इस दिन महिलाएं सजती-संवरती हैं, सुंदर वस्त्र पहनती हैं और हाथों में मेहंदी रचाती हैं। इस व्रत में मेहंदी लगाना बेहद शुभ माना जाता है। पति-पत्नी एक-दूसरे को उपहार देकर इसे और भी माधुर्य बना सकते हैं।
ब्रह्ममुहुर्त में खाएं सरगी, सास को भी दें उपहार
करवा चौथ का व्रत आरंभ होने से पहले ब्रह्म मुहूर्त में सरगी खाने की परंपरा है, जो सास की तरफ से दी जाती है। करवा चौथ के दिन व्रत से पहले सरगी खाने की परंपरा है। इसे सूर्योदय से पहले ब्रह्म मुहूर्त में खाया जाता है। सरगी के बदले में चाहें तो आप अपनी सास को कोई उपहार भी दे सकती हैं। उपहार में शृंगार का सामान, पायल, बिछिया अथवा मिठाई हो सकते हैं। सरगी खाने के पीछे दो धार्मिक कथाएं काफी प्रचलित है। पहली कथा के अनुसार, जब माता पार्वती ने भगवान शिव की दीर्घायु और कल्याण के लिए पहली बार करवा चौथ का व्रत रखा था, तब उनकी सास जीवित नहीं थीं। उस समय उनकी माता मैना देवी ने उन्हें व्रत से पहले एक विशेष सरगी थाली दी थी, जिसमें पौष्टिक और शुभ खाद्य पदार्थ शामिल थे। तभी से यह परंपरा शुरू हुई कि यदि सास जीवित न हों, तो मायके से मां भी सरगी भेज सकती हैं, ताकि बेटी प्रेम और आशीर्वाद के साथ व्रत आरंभ कर सके। सरगी खाने की दूसरी परंपरा के अनुसार, महाभारत काल में द्रौपदी ने अपने पांडवों पतियों की दीर्घायु और रक्षा के लिए करवा चौथ का व्रत रखा था, तब उनकी सास कुंती ने उन्हें सरगी दी थी। इस प्रसंग से यह परंपरा और भी दृढ़ हो गई कि सरगी ससुराल पक्ष, विशेष रूप से सास की ओर से दी जानी चाहिए, जो इसे अपनी बहू के प्रति आशीर्वाद, स्नेह और शुभकामनाओं के प्रतीक के रूप में प्रदान करती हैं।

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