आचार्य भिक्षु द्वेषी के प्रति भी आत्मीयभाव रखते थे : साध्वी जिनबाला
बीकानेर। जन जन के उन्नायक, शान्ति प्रदायक, शान्तिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी की सुशिष्या साध्वीश्री जिनबालाजी के सान्निध्य में आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा के दिन तेरापंथ सभा भवन भीनासर में तेरापंथ स्थापना दिवस मनाया गया। कार्यक्रम के शुभारम्भ में शारदा देवी बैद ने मंगलाचरण किया। साध्वीश्री जिनबालाजी ने पावन प्रवचन में कहा कि तेरापंथ के निर्माण में पुरुषार्थ और नियति का समन्वित योग है। तेरापंथ की स्थापना में एक ओर आचार्य भिक्षु के अप्रतिम पुरुषार्थ की ज्योति का योग है तो दूसरी ओर नियति द्वारा उद्घाटित नए-नए आयामों का अभूतपूर्व योग है। इसलिए विरोध की तेज आंधियों के बीच भी तेरापंथ आकर्षण का केन्द्र बनता गया।
‘हे प्रभो यह तेरापंथ….Ó इस संबोधन के साथ तेरापंथ का शिलान्यास हुआ। उसमें आचारशुद्धि, विचार शुद्धि और व्यवहार शुद्धि की कंकरीट डाली गई तथा आत्मोत्थान की वेगवती भावना के साथ संघ की ईमारत खड़ी हुई। गंगाशहर शांतिनिकेतन से समागत सेवाकेन्द्र व्यवस्थापिका साध्वीश्री लब्धियशाजी ने तेरापंथ की स्थापना के बारे में विस्तृत जानकारी देते हुए कहा कि आचार्य भिक्षु विरोध को भी विनोद में परिवर्तित कर देते थे। आज के इस कार्यक्रम में तेरापंथ युवक परिषद के अध्यक्ष सुमति पुगलिया, तेरापंथ महिला मंडल अध्यक्षा शशि गोलछा, सुरेन्द्र सेठिया, पारस सेठिया, प्रियंका भंसाली, कोमल जैन, प्रेरणा कोचर, प्रमिला सेठिया, नीलम कोचर, शुचि पुगलिया, पिंकी बुच्चा आदि ने भी कविता, गीत व मुक्तक आदि के माध्यम से विचार प्रस्तुत किये। कार्यक्रम का संचालन साध्वीश्री प्राचीप्रभाजी ने किया।

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